सभी विषय

एकादशी व्रत कथाएँ

चौथ माता व्रत कथाएँ

तीज व्रत कथाएँ

देव चालीसा संग्रह

देव आरती संग्रह

दीपावली-लक्ष्मीपूजन

देवी आरती संग्रह

देवी चालीसा संग्रह

नवदुर्गा और नवरात्रि

श्री सत्यनारायण व्रत कथा

व्रत कथाएँ

प्रदोष व्रत कथाएँ

सरल पूजन विधि

साप्ताहिक व्रत कथा

Athshri Logo
a

पितृ पक्ष श्राद्ध 2024 | Pitra Paksha Shradh 2024

व्रत कथाएँ

Pitra Shradh Paksha 2024

पितृ पक्ष श्राद्ध 2024 | Pitra Paksha Shradh 2024

श्राद्ध कर्म का यह संदेश है कि पितरों के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करना हर संतान का कर्तव्य है। श्राद्ध के माध्यम से पितरों की आत्मा को शांति दी जाती है, और उनके आशीर्वाद से वंशजों को सुख, समृद्धि और सफलता प्राप्त होती है।

2024 में श्राद्ध पक्ष की तिथियाँ

श्राद्ध पक्ष या पितृ पक्ष हिंदू पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के पूर्णिमा के दिन से आरंभ होता है और आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है। यह 16 दिनों का होता है और इस दौरान पितरों के लिए श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और दान-पुण्य किया जाता है। इसे “महालय श्राद्ध पक्ष” भी कहा जाता है।

भाद्रपद पूर्णिमा श्राद्ध

17 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:52 AM से 12:43 PM

प्रतिपदा श्राद्ध

18 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:52 AM से 12:43 PM

द्वितीया श्राद्ध

19 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:51 AM से 12:43 PM

तृतीया श्राद्ध

20 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:50 AM से 12:42 PM

चतुर्थी श्राद्ध

21 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:50 AM से 12:41 PM

पंचमी श्राद्ध

22 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:49 AM से 12:41 PM

षष्ठी श्राद्ध

23 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:48 AM से 12:40 PM

सप्तमी श्राद्ध

24 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:48 AM से 12:39 PM

अष्टमी श्राद्ध

25 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:47 AM से 12:39 PM

नवमी श्राद्ध

26 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:46 AM से 12:38 PM

दशमी श्राद्ध

27 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:46 AM से 12:38 PM

एकादशी श्राद्ध

28 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:45 AM से 12:37 PM

द्वादशी श्राद्ध

29 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:45 AM से 12:37 PM

त्रयोदशी श्राद्ध

30 सितंबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:43 AM से 12:36 PM

चतुर्दशी श्राद्ध

1 अक्टूबर 2024

कुतुप मूहूर्त
11:52 AM से 12:41 PM

आश्विन अमावस्या

2 अक्टूबर 2024

(सर्व पितृ श्राद्ध) कुतुप मूहूर्त
11:42 AM से 12:35 PM

॥ महत्त्व ॥

श्राद्ध पक्ष, जिसे पितृ पक्ष भी कहा जाता है, हिंदू धर्म में बहुत महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठान है। इसे पूर्वजों (पितरों) के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करने का समय माना जाता है। यह अनुष्ठान सनातन धर्म में यह विश्वास दर्शाता है कि मृत्यु के बाद आत्मा एक अलग यात्रा पर निकलती है, लेकिन उसकी शांति और मुक्ति के लिए जीवित लोगों द्वारा किए गए कर्म महत्वपूर्ण होते हैं। श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों के लिए विशेष पूजा, तर्पण और पिंडदान किया जाता है ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले और वे परलोक में सुखी रहें।

श्राद्ध पक्ष का महत्व

पितृ ऋण: हिंदू धर्म में कहा गया है कि हर इंसान पर तीन ऋण होते हैं: देव ऋण, ऋषि ऋण, और पितृ ऋण। पितृ ऋण को चुकाने के लिए श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। यह माना जाता है कि यदि पितरों की आत्मा को शांति नहीं मिलती है, तो उनके वंशजों को जीवन में कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है।

पूर्वजों का आशीर्वाद: श्राद्ध कर्म के माध्यम से परिवार के सदस्य अपने पितरों को आशीर्वाद पाने के लिए सम्मान देते हैं। पितरों के आशीर्वाद से वंश वृद्धि, सुख-समृद्धि और कल्याण प्राप्त होता है।

आत्मा की शांति: माना जाता है कि श्राद्ध कर्म से पितरों की आत्मा को शांति और मोक्ष प्राप्त होता है। इसके बिना उनकी आत्मा पृथ्वी पर भटकती रहती है, जिससे उनके वंशजों के जीवन में समस्याएं आ सकती हैं।

॥ श्राद्ध कथा ॥

श्राद्ध पक्ष से जुड़ी मुख्य कथा महाभारत के एक प्रमुख पात्र कर्ण से संबंधित है, जो श्राद्ध कर्म की महत्ता को स्पष्ट करती है। यह कथा बताती है कि श्राद्ध कर्म क्यों आवश्यक है और इससे पितरों को कैसे शांति मिलती है। इस कथा के अनुसार, श्राद्ध न करने के परिणाम और पितरों के प्रति सम्मान व्यक्त करने का महत्व उजागर होता है।

कर्ण और श्राद्ध की कथा

कर्ण, महाभारत के सबसे शक्तिशाली योद्धाओं में से एक थे, जो अपनी दानशीलता और वीरता के लिए प्रसिद्ध थे। कर्ण ने जीवनभर दान-पुण्य और वीरता के कार्य किए, लेकिन उन्हें यह ज्ञात नहीं था कि श्राद्ध कर्म भी आवश्यक होता है। यह कहानी कर्ण की मृत्यु के बाद की है:

कर्ण की मृत्यु और स्वर्ग की यात्रा:

महाभारत के युद्ध में कर्ण की मृत्यु हो जाती है, और उनकी आत्मा स्वर्ग में जाती है। स्वर्ग में पहुंचने पर, उन्हें बहुत आदर-सम्मान मिलता है, लेकिन जब उन्हें भोजन के रूप में सोना और रत्न दिए जाते हैं, तो वे हैरान हो जाते हैं। कर्ण ने इंद्र देव से पूछा कि उन्हें भोजन की जगह सोना और रत्न क्यों दिए जा रहे हैं।

इंद्र देव का उत्तर:

इंद्र देव ने कर्ण को बताया कि उन्होंने अपने जीवन में हमेशा गरीबों और जरूरतमंदों को सोना, रत्न, धन और अन्य वस्त्रों का दान किया, लेकिन कभी भी अपने पितरों के लिए अन्न और जल का दान नहीं किया। चूंकि उन्होंने अपने पूर्वजों का श्राद्ध नहीं किया था, इसलिए उन्हें स्वर्ग में भोजन के रूप में सोने और रत्न दिए जा रहे हैं। पितरों के लिए किया गया अन्न-जल दान ही उनकी आत्मा की शांति के लिए आवश्यक होता है।

कर्ण की प्रार्थना:

कर्ण को इस बात का गहरा अफसोस हुआ और उन्होंने इंद्र देव से प्रार्थना की कि उन्हें धरती पर वापस भेजा जाए ताकि वह अपने पितरों का श्राद्ध कर्म कर सकें और उनके लिए अन्न-जल का दान करें। इंद्र देव ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और कर्ण को 16 दिनों के लिए पृथ्वी पर भेजा। इन 16 दिनों के दौरान कर्ण ने अपने पितरों का श्राद्ध किया, तर्पण और पिंडदान किया, जिससे उनके पितरों की आत्मा को शांति मिली।

श्राद्ध पक्ष की उत्पत्ति:

कर्ण के इस कार्य से श्राद्ध पक्ष की परंपरा शुरू हुई। इसे पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष के रूप में मनाया जाने लगा, जो 16 दिनों तक चलता है। इस समय के दौरान पितरों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है। श्राद्ध पक्ष के दौरान, लोग अपने पितरों के लिए अन्न, जल, तिल और अन्य सामग्री का दान करते हैं ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले और वे मोक्ष प्राप्त कर सकें।

इस कथा के माध्यम से श्राद्ध कर्म का महत्व और पितरों के प्रति आस्था की भावना को समझा जा सकता है।

श्राद्ध

पितरजिस मृत व्यक्ति को इस भवसागर से मुक्त हुए एक साल से अधिक समय हो जाता है उसे ‘पितर’ कहा जाता है।

शास्त्रों एवं ग्रंथों में वसु, रुद्र और आदित्य को श्राद्ध का देवता बताया गया है। श्राद्ध पक्ष में हर व्यक्ति के तीन पूर्वजों पिता, दादा और परदादा को क्रम से वसु, रुद्र और आदित्य माना जाता है। जब पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है तब वे (पिता, दादा और परदादा) ही सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। माना जाता है कि पिता, दादा और परदादा, श्राद्ध-कर्म से तृप्त होकर परिवार को सुख-समृद्धि और बेहतर स्वास्थ्य का आशीर्वाद देते हैं।

श्राद्ध का दिन ?

पितृ पक्ष के दौरान पूर्वज़ों का श्राद्ध किस तिथि पर किया जाए, इस प्रश्न का मान्यताओं अनुसार सही जवाब है कि अगर आपको पितर, पूर्वज़ या परिवार के मृत सदस्य के परलोक गमन की तिथि याद हो तो पितृ पक्ष में पड़ने वाली उक्त तिथि को ही उनका श्राद्ध किया जाना चाहिए।

यदि देह त्यागने की तिथि के बारे में पता नहीं हो, तो इस स्थिति में आश्विन अमावस्या को श्राद्ध कर सकते है इसलिए ही इसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। यदि किसी परिजन की असमय मृत्यु अर्थात किसी दुर्घटना, आत्महत्या आदि से अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को करना चाहिए। पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का श्राद्ध नवमी तिथि को करना उपयुक्त माना गया है।

पूजन सामग्री

पूजन सामग्री को व्यवस्थित रूप से ( पूजन शुरू करने के पूर्व ) पूजा स्थल पर जमा कर रख लें, जिससे पूजन में अनावश्यक व्यवधान न हो।
यदि इनमे से कुछ सामग्री ना जुटा सकें तो कोई बात नहीं, जितनी सामग्री सहर्ष जुटा सकें उसी से भक्ति भावना से पूजा करें।

तिल: काले तिल का उपयोग तर्पण और हवन में किया जाता है। तिल पवित्रता और पूर्वजों के प्रति सम्मान का प्रतीक होता है।

कुशा (कुश घास): श्राद्ध कर्म में कुशा का उपयोग अत्यधिक पवित्र माना जाता है। इससे तर्पण और पूजा की जाती है।कहा जाता है कि कुश और तिल दोनों भगवान विष्णु के शरीर से निकले हैं। गरुड़ पुराण में बताया गया है कि कुश में ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों का वास होता है। कुश का अग्रभाग देवताओं का माना जाता है। मध्य भाग मनुष्यों का और जड़ पितरों की मानी जाती है। तिल पितरों को प्रिय होते हैं और नकारात्मक ऊर्जा को दूर करते हैं। इसलिए श्राद्ध की पूजा में कुश एवं तिल को जरूर शामिल किया जाता है।

जल: तर्पण के लिए शुद्ध जल का उपयोग किया जाता है। इसे तिल और कुश के साथ मिलाकर पितरों को अर्पित किया जाता है।

पिंड: चावल के आटे, जौ और तिल से बने पिंडों का उपयोग पिंडदान में होता है। इसे घी से मिलाकर बनाया जाता है।

दूध, घी और शहद: पिंड और हवन सामग्री में इनका उपयोग किया जाता है।

फूल और माला: तर्पण और श्राद्ध के समय पितरों की पूजा के लिए फूल और माला अर्पित की जाती हैं।

धूप, दीप और अगरबत्ती: पूजा के दौरान धूप, दीप और अगरबत्ती जलाकर पितरों का आह्वान किया जाता है।

मिठाई और भोजन: श्राद्ध में पितरों के लिए खास भोजन तैयार किया जाता है, जो ब्राह्मणों को अर्पित किया जाता है। इसमें खीर, पूरी, दाल, चावल और मौसमी सब्जियों का भोग लगता है।

रुई के बत्तियां: घी का दीपक जलाने के लिए रुई की बत्तियों का प्रयोग होता है।

पवित्र वस्त्र: ब्राह्मणों को भोजन कराने के बाद उन्हें नए वस्त्र दान में दिए जाते हैं।

पंच पात्री: तर्पण के लिए पंच पात्री या छोटी कटोरी का प्रयोग होता है।

गोमूत्र और गंगाजल: शुद्धिकरण के लिए इनका उपयोग होता है।

पूजन की विधि

इन 16 दिनों में प्रत्येक दिन किसी विशेष तिथि को दिवंगत पितरों के लिए श्राद्ध किया जाता है, खासकर उनके मृत्यु के दिन की तिथि के अनुसार।

श्राद्ध पक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए किया जाने वाला श्राद्ध कर्म एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। इसे विधिपूर्वक करने के लिए सही पूजा सामग्री (पूजन सामग्री) और विधि का पालन करना आवश्यक होता है। श्राद्ध कर्म को शास्त्रों में बताए गए अनुसार किया जाता है।

श्राद्ध कर्म में मुख्य रूप से तीन क्रियाएं की जाती हैं – तर्पण, पिंडदान और ब्राह्मण भोज। इनका आयोजन विधिपूर्वक करने के लिए निम्नलिखित चरणों का पालन किया जाता है:

तिथि का चयन: श्राद्ध करने के लिए पितरों की मृत्यु की तिथि के अनुसार श्राद्ध पक्ष की तिथि तय की जाती है। इस दिन व्यक्ति अपने पूर्वजों का तर्पण करता है। 

तर्पण विधि:

स्थान: श्राद्ध करने के लिए एक पवित्र और शांत स्थान का चयन करें, जो घर का आंगन या किसी नदी, तालाब के पास हो सकता है।
स्नान: श्राद्ध करने वाला व्यक्ति शुद्ध जल से स्नान करे और शुद्ध वस्त्र धारण करे।
तर्पण सामग्री: हाथ में कुशा, तिल और जल लेकर तर्पण करें। पितरों का नाम लेकर उनके प्रति जल अर्पण करें।
विधि: तिल, कुश और जल को एक साथ लेकर “पितरों” का स्मरण करें और तीन बार जल अर्पण करें। इसे पितरों की आत्मा की शांति के लिए किया जाता है।

पिंडदान विधि:

पिंड की तैयारी: पिंड को चावल के आटे, जौ, तिल, और घी से तैयार किया जाता है।
पिंडदान का स्थान: यह क्रिया आमतौर पर किसी पवित्र स्थल पर की जाती है, जैसे गया या किसी नदी किनारे।
विधि: पिंड को पवित्र स्थान पर रखकर, उसे पितरों के नाम अर्पित किया जाता है। प्रत्येक पिंड को जल और तिल अर्पण करते हुए, पितरों की शांति के लिए प्रार्थना की जाती है।

पितरों का आह्वान:

पूजा में पितरों का आह्वान किया जाता है। धूप और दीप जलाकर पितरों के लिए पवित्र भोजन और पिंड को अर्पित किया जाता है।
मंत्र उच्चारण के साथ पितरों का आह्वान किया जाता है, जिससे उनकी आत्मा की शांति के लिए आशीर्वाद प्राप्त हो।

ब्राह्मण भोजन:

ब्राह्मणों को भोजन कराना श्राद्ध कर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पितरों के लिए बनाया गया भोजन ब्राह्मणों को अर्पित किया जाता है।
भोजन के बाद ब्राह्मणों को दान देना चाहिए, जिसमें वस्त्र, धन और अन्य उपयोगी वस्तुएँ शामिल हो सकते हैं।

दान और विसर्जन:

श्राद्ध के दिन भोजन के साथ-साथ वस्त्र, धन, तांबे के पात्र, बर्तन और जरूरतमंदों को दान किया जाता है। यह पितरों के नाम पर किया जाता है।
श्राद्ध कर्म के अंत में पितरों को आभार व्यक्त करते हुए जल, तिल और कुश से तर्पण किया जाता है और उनकी आत्मा को शांति की प्रार्थना की जाती है।

श्राद्ध पूजा में संयम, सात्विक आहार, और ध्यान का महत्व होता है। इसे विधिपूर्वक करने से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और परिवार में सुख-समृद्धि आती है।

error: Content is protected !!